लखीसराय। भागलपुर के चर्चित विक्रमशिला सेतु हादसे के बाद अब बिहार के कई बड़े पुलों और रेलवे ओवरब्रिज की सुरक्षा व्यवस्था कटघरे में है। इसी कड़ी में जब राज्यभर के पुलों का तकनीकी निरीक्षण शुरू हुआ, तब लखीसराय के बायपास आरओबी और मलिया पुल की भी जांच कराई गई। जांच में जो सामने आया, उसने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। शहर की लाइफलाइन माने जाने वाले 146 करोड़ रुपये की लागत से बने बायपास आरओबी में कई जगहों पर दरारें और तकनीकी खामियां मिलने के बाद भारी वाहनों की आवाजाही रोकने की तैयारी शुरू कर दी गई है।

सबसे बड़ा सवाल अब यही उठ रहा है कि अगर विक्रमशिला सेतु हादसा नहीं होता, तो क्या लखीसराय के पुलों की जांच होती? और अगर जांच नहीं होती, तो क्या आने वाले दिनों में यहां भी किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार किया जा सकता था?

दरअसल, लखीसराय बायपास आरओबी का निर्माण शहर को जाम से राहत देने और भारी वाहनों की सुगम आवाजाही के लिए कराया गया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि करोड़ों की लागत से बना यह पुल महज छह साल के भीतर ही “बीमार” पड़ गया। शुरुआती तकनीकी जांच में पुल के कई स्पैन और जॉइंट हिस्सों में क्रैक मिलने की पुष्टि हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कई महीनों से पुल के नीचे कंपन और असामान्य आवाजें महसूस की जा रही थीं, लेकिन किसी स्तर पर गंभीरता से निरीक्षण नहीं कराया गया।
इधर, विक्रमशिला सेतु हादसे ने पूरे बिहार को झकझोर दिया। बताया जा रहा है कि पुल की खराब स्थिति को लेकर पहले भी कई बार चेतावनी दी गई थी, लेकिन समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार पुल का एक हिस्सा ध्वस्त हो गया और उसके बाद सरकार हरकत में आई। हादसे के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने राज्य के सभी प्रमुख पुलों और आरओबी का सेफ्टी ऑडिट कराने का निर्देश दिया। उसी आदेश के बाद लखीसराय सहित कई जिलों में पुलों की जांच शुरू हुई।
लखीसराय में अब लोग खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा था?

क्योंकि जिस पुल को शहर की सबसे महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाओं में गिना जाता है, उसमें कुछ ही वर्षों के भीतर दरारें मिलना निर्माण गुणवत्ता, निगरानी व्यवस्था और मेंटेनेंस सिस्टम—तीनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों की मानें तो किसी भी पुल में शुरुआती वर्षों में इस तरह की दरारें सामान्य नहीं मानी जातीं। लगातार ओवरलोड वाहनों की आवाजाही, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता में कमी और समय-समय पर तकनीकी निगरानी नहीं होना इसकी बड़ी वजह हो सकती है। यही कारण है कि अब स्थानीय लोग पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच और जिम्मेदार एजेंसियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
फिलहाल गनीमत यही मानी जा रही है कि विक्रमशिला सेतु हादसे के बाद राज्य सरकार सक्रिय हुई और समय रहते लखीसराय के पुलों की भी जांच हो गई। वरना जिस तरह की स्थिति सामने आ रही है, उससे किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता था। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार सिर्फ जांच तक सीमित रहती है या फिर पुलों की सुरक्षा और निर्माण गुणवत्ता को लेकर स्थायी समाधान भी निकालती है।








