महिला दारोगा ने बेटे की नौकरी के लिए जदयू नेता को दिए 40 लाख, रिजल्ट नहीं आया तो खुली ‘सेटिंग’ की कहानी
अगर पैसों का विवाद नहीं होता तो क्या कभी सामने आता यह मामला?
पटना से सामने आया BPSC परीक्षा में कथित घूसखोरी का मामला अब बिहार की राजनीति, पुलिस महकमे और प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। मामला सिर्फ धोखाधड़ी का नहीं, बल्कि उस कथित नेटवर्क का है जहां नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों रुपये का खेल होने का आरोप है। आरोप है कि पटना पुलिस की महिला दारोगा आशा सिंह ने अपने बेटे रितेश को BPSC परीक्षा में पास कराने के लिए जदयू प्रदेश महासचिव डॉ. धर्मेंद्र कुमार को 40 लाख रुपये दिए थे। दावा किया गया था कि प्रभाव और संपर्क के जरिए परीक्षा में सफलता सुनिश्चित कराई जाएगी। लेकिन जब रिजल्ट आया और रितेश का नाम मेरिट लिस्ट में नहीं मिला तो पूरा मामला उलझ गया।
चेक बाउंस हुआ तो खुलने लगी परतें
जानकारी के मुताबिक, बेटे के असफल होने के बाद महिला दारोगा ने पैसे वापस मांगे। आरोप है कि डॉ. धर्मेंद्र कुमार की ओर से 25 लाख रुपये का चेक दिया गया, लेकिन वह बाउंस हो गया। बाकी 15 लाख रुपये भी वापस नहीं किए गए। इसके बाद जनवरी 2024 में जक्कनपुर थाने में मामला दर्ज कराया गया। यहीं से वह कहानी शुरू हुई जिसने अब पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि अगर पैसे का विवाद नहीं होता तो क्या यह कथित रैकेट कभी सामने आता?

हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद बढ़ी जांच
मामला जब पटना हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने भी सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने पूछा कि आखिर एक दारोगा के पास 40 लाख रुपये कहां से आए और किस भरोसे पर इतनी बड़ी रकम दी गई? अदालत के सवालों के बाद मामला और गंभीर हो गया। इसके बाद एसएसपी की अनुशंसा और पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने इस पूरे मामले में FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
पांच लोगों पर केस, राजनीतिक गलियारों में भी हलचल
EOU ने महिला दारोगा आशा सिंह, उनके बेटे रितेश, जदयू नेता डॉ. धर्मेंद्र कुमार, उनकी पत्नी और ससुर समेत कुल पांच लोगों को आरोपी बनाया है। डॉ. धर्मेंद्र कुमार पहले राजद में सक्रिय रहे थे और कुम्हरार विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ चुके हैं। बाद में उन्होंने जदयू का दामन थामा। अब इस पूरे प्रकरण ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल बढ़ा दी है।
मेहनत नहीं, ‘मैनेजमेंट’ से नौकरी?
यह मामला सिर्फ एक परिवार या एक नेता तक सीमित नहीं माना जा रहा। पूरे घटनाक्रम ने उस सोच को उजागर कर दिया है जिसमें प्रतियोगी परीक्षाओं को मेहनत नहीं बल्कि ‘सेटिंग’ और ‘मैनेजमेंट’ के जरिए पास कराने का दावा किया जाता है।
अगर जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला बिहार की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली पर बड़ा दाग माना जाएगा। लाखों छात्र वर्षों तक मेहनत कर परीक्षा की तैयारी करते हैं, ऐसे में इस तरह के आरोप युवाओं के भरोसे को भी तोड़ते हैं।
अब सबकी नजर EOU जांच पर
फिलहाल आर्थिक अपराध इकाई पूरे मामले की जांच में जुटी है। अब देखना होगा कि जांच सिर्फ पैसों के लेन-देन तक सीमित रहती है या फिर किसी बड़े नेटवर्क का भी खुलासा होता है। सवाल सिर्फ 40 लाख रुपये का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिस पर लाखों युवाओं का भविष्य टिका है।









