1983 में शुरू हुई इंसानियत की अनोखी मिसाल
चेन्नई की संस्था ‘उदवम करंगल’ आज उन हजारों बच्चियों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम बन चुकी है, जिन्हें जन्म के बाद समाज ने बेसहारा छोड़ दिया था। इस संस्था की शुरुआत वर्ष 1983 में हुई, जब इसके संस्थापक एस. विद्याकर ने एक नवजात बच्ची को मौत के मुंह से बचाया। करुणा का वही एक कदम आगे चलकर मानवता के सबसे बड़े मिशनों में बदल गया।


सिर्फ आश्रय नहीं, बेटियों को मिला परिवार जैसा प्यार
‘उदवम करंगल’ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ बच्चियों को केवल खाना, कपड़ा और शिक्षा ही नहीं दी जाती, बल्कि उन्हें परिवार जैसा अपनापन और भावनात्मक सुरक्षा भी मिलती है। संस्था ने उन बच्चियों को नई पहचान दी, जिन्हें कभी समाज ने “बोझ” समझकर ठुकरा दिया था। वरिष्ठ मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती जयंती बताती हैं कि बचपन में छोड़े जाने का दर्द जीवन भर इंसान के मन में रह जाता है। खासकर लड़कियों के साथ समाज का व्यवहार अक्सर बेहद कठोर होता है। लेकिन ‘उदवम करंगल’ ने इस सोच को बदलने का काम किया है।

बेसहारा बच्चियों से आत्मनिर्भर महिलाओं तक का सफर
संस्था में पली-बढ़ी कई बच्चियाँ आज पढ़-लिखकर डॉक्टर, प्रोफेशनल और जिम्मेदार नागरिक बन चुकी हैं। यही नहीं, वे अपने परिवारों के साथ सम्मानजनक जीवन जी रही हैं। कभी जिन्हें अपनाने वाला कोई नहीं था, आज वही बेटियाँ समाज के लिए प्रेरणा बन गई हैं।

बेटियों की शादी में निभाई माता-पिता की जिम्मेदारी
भारतीय संस्कृति में बेटी का विवाह माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानी जाती है। ऐसे में जिन बच्चियों का कोई परिवार नहीं होता, उनका भविष्य अक्सर अधूरा रह जाता है। लेकिन ‘उदवम करंगल’ ने इस जिम्मेदारी को भी पूरी संवेदनशीलता के साथ निभाया। संस्था योग्य वर की तलाश से लेकर विवाह की हर तैयारी करती है। दुल्हनों को गहने, रेशमी साड़ियाँ, घरेलू सामान और नई जिंदगी शुरू करने के लिए हर जरूरी सहयोग दिया जाता है। सबसे खास बात यह है कि विवाह के बाद भी संस्था इन बेटियों के साथ खड़ी रहती है।
अब तक 270 बेटियों की करवाई शादी
संस्था अब तक 270 छोड़ी गई बच्चियों की शादी करवा चुकी है। आज ये महिलाएँ अपने परिवारों के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जी रही हैं। वहीं, 82 अन्य बच्चियों का अभी भी पालन-पोषण किया जा रहा है, ताकि उन्हें सुरक्षित और बेहतर भविष्य मिल सके।

शादी के बाद भी कायम रहता है अपनापन
इस कहानी का सबसे भावुक पहलू यह है कि शादी के बाद भी ये बेटियाँ अपने पति और बच्चों के साथ संस्था में आती हैं और एस. विद्याकर को प्यार से “पप्पा” कहकर बुलाती हैं। त्योहारों, बच्चे के जन्म और हर खास मौके पर वे उनसे आशीर्वाद लेने जरूर पहुंचती हैं। यही रिश्ता ‘उदवम करंगल’ को एक संस्था नहीं, बल्कि एक बड़े परिवार में बदल देता है।
खुद शादी नहीं की, पूरी जिंदगी सेवा में कर दी समर्पित
एस. विद्याकर ने स्वयं कभी विवाह नहीं किया। उन्होंने अपना पूरा जीवन बेसहारा बच्चों, गरीबों और कमजोर लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया। आज वे सिर्फ समाजसेवी नहीं, बल्कि सैकड़ों बेटियों और उनके बच्चों के लिए पिता और दादा समान बन चुके हैं।
इंसानियत की सबसे खूबसूरत मिसाल
ऐसे दौर में जब दुनिया सफलता को दौलत और ताकत से मापती है, ‘उदवम करंगल’ जैसी कहानियाँ यह याद दिलाती हैं कि किसी समाज की असली ताकत उसकी इंसानियत और करुणा में होती है। यह कहानी सिर्फ छोड़ी गई बच्चियों को बचाने की नहीं, बल्कि उन्हें सम्मान, पहचान, अपनापन और परिवार देने की कहानी है। ‘उदवम करंगल’ यह साबित करता है कि दुनिया बदलने के लिए बड़ी ताकत नहीं, बल्कि बड़ा दिल चाहिए।







